सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

उन दिनों प्यार करने को

उन दिनों प्यार करने को

उन दिनों प्यार करने को
और कुछ था भी नहीं
तुम्हारे सिवाय,
न सिरफिरा मौसम था
न बादलों की झुकी लट थीं
न  नदियों के घुमाव थे
न बर्फ से ढकी पहाड़ियां थीं,
सच कहूँ तो कुछ दिखता ही नहीं था।
इन दिनों कहने को
और कुछ है भी नहीं
एक ईश्वर है वह भी अकेला है।
**महेश रौतेला

मन से कितनी धूल उड़ी

मन से कितनी धूल उड़ी

मन से कितनी धूल उड़ी
वे कहते यह राजनीति है
कोहरा जैसा जहां लगा है
वे कहते यह कूटनीति है।

भूमि जहां-जहां बंजर है
वे कहते हैं सब सरकारी है
नारे जो जो उनके हैं
वे कहते हैं  पावन हैं।

मन से बहुत धूल उड़ी
वे कहते हैं राह साफ है
आसमान में धुंध लगी है
वे कहते हैं घन घिरे हैं ।
**महेश रौतेला

बुधवार, 8 मार्च 2017

अभी सुनहरी यात्रा बाकी है

अभी सुनहरी यात्रा बाकी है
धरती रुकी नहीं है
सूरज ठहरा नहीं है
फसल का उगना बंद नहीं हुआ है
प्यार के किस्से सोये नहीं हैं
साथ की बातें जमी नहीं हैं,
अभी आदमी में सत्य शेष है
ज्ञान बिखरा पड़ा है
रोटी का संघर्ष जारी है
घर का दरवाजा आधा ही खुला है
खिड़कियों से रोशनी आ रही है
आसमान टिमटिमा रहा है
कथा की इति शेष है
बहुत से कथानक और बनने हैं।
अभी अगली बर्फ गिरेगी
अगला वसंत आयेगा
अगला साल सुधार लायेगा
अगली मुलाकात होगी
अगला त्योहार और अच्छा होगा
पेड़ों पर पक्षियां बैठेंगी
पहाड़ों पर चढ़ना चलता रहेगा
चुनावों से नयी संसद बनेगी,
जिस भाषा में चुनाव होगा
राजकाज उसी में चलेगा
गरीबी का गणित सुलझ जायेगा।
अभी सुनहरी यात्रा बाकी है
धरती रुकी नहीं है
सूरज ठहरा नहीं है।
**महेश रौतेला

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

उठो, हिमालय आज उठो

उठो हिमालय, आज उठो
तुम तक झंडा आया है,
श्याम-श्वेत जैसा भी हो
जय जयकार लाया है,
उठो भारत, आज उठो
तुम तक तिरंगा आया है,
श्याम-श्वेत जैसा भी हो
जय जयकार लाया है।
उठो गंगा, आज उठो
तुम तक मानव आया है,
श्याम-श्वेत जैसा भी हो
जय जयकार लाया है।
उठो जनता, आज उठो
तुम्हारी भाषा आयी है,
श्याम-श्वेत जैसी भी हो
जय जयकार लायी है।
उठो आत्मा, आज उठो
तुम तक सत्य आया है,
श्याम-श्वेत जैसा भी हो
जय जयकार लाया है।
**महेश रौतेला

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

गुफा

गुफा:
आज हिमालय की गुफा में बैठा हूँ, गुफा बहुत बड़ी है।अंदर अंधकार है, बाहर थोड़ा प्रकाश।गुफा के अंदर से बहुत आवाजें आ रही हैं।उस अंधकार में सभायें हो रही हैं, प्रजातंत्र की।सब आवाजें भारतीय लग रही हैं।भाषणों में सभी को बहुमत मिल रहा है।यहाँ अंग्रेजी में कोई भाषण नहीं कर रहा है।पता नहीं कहाँ और क्यों गायब है? बर्फ गिरने लगी है।गुफा का मुँह बंद होने को है।इतने में गुफा के ऊपर एक आदमी गा रहा है-" सारे जहां से अच्छा...।" सुनने में अच्छा लग रहा है।मैं गुफा के अन्दर जाता हूँ और पूछता हूँ ,"सारे जहां से अच्छा...।" किसी ने सुना है। हाँ में उत्तर नहीं मिलता है।मैं बिहोश हो जाता हूँ।होश में आने पर देखता हूँ कि लोगों से घिरा हूँ।वे ,"सारे जहां से अच्छा...।" का अर्थ पूछने लगे।मैंने कहा कि," जब राष्ट्र की अपनी भाषा, संस्कृति, शिक्षा और टेक्नोलॉजी हो। वह आत्मनिर्भर हो। लोग गरीब न हों, तो तब ,"सारे जहां से अच्छा...।" देश को बोला जाता है।
पास में दूसरी गुफा है वहाँ से आवाज आयी," कुछ तो बात है, कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।" उस गुफा में गुलामी दूर-दूर तक फैली थी।अपने स्वाभिमान को जगाने की कोशिश ये कर रहे थे।
तीसरी गुफा से आवाज आयी," कुछ तो बात है लोगों में, कि गुलामी मिटती नहीं।" मैं सोच में डूब गया।उस गुफा पर गया और पूछा भई, क्या बात है? अन्दर झांका तो गरीबी दिख रही थी।मैंने बोला कितने लोग यहाँ रहते हैं, वे बोले लगभग अस्सी करोड़ होगी।ठीक-ठीक पता नहीं। फिर बोले "रोजगार, उच्च शिक्षा और न्याय आदि हमारी भाषा में नहीं है, सब अंग्रेजी में होता है। हमारी गरीबी का सबसे बड़ा कारण यही है।"मैं बोला," यह अंग्रेजीनुमा अंधकार है।"
पीछे से एक आवाज आयी," कुछ तो बात है सरकारों में, कि गुलामी मिटती नहीं।"
***महेश रौतेला

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

पेड़ के नीचे बैठा हूँ

पेड़ के नीचे बैठा हूँ।मंदिर में हनुमान चालीसा चल रहा है।
"पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरत रूप, राम लखन सिया सहित ह्रदय बसहुँ सुर भूप।"
इधर एक गाने की आवाज आ रही है-
" हर पल यहाँ जीभर जियो
जो है समा कल हो ना हो--।"
इतने में एक गिलहरी मेरे पैर से चढ़, पैन्ट में घुस गयी है।मैं घबरा कर खड़ा हो जाता हूँ। पैन्ट हिलाता हूँ और वह और ऊपर चढ़ गयी है, कमर के पास, जहाँ पैन्ट बँधी होती है।मैं घबराहट में पैन्ट खोलता हूँ। उसे झटकता हूँ।फिर पीठ पर इस आशंका से हाथ फेरता हूँ कि कहीं वह कमीज के नीचे न हो।उसने काटा नहीं क्योंकि वह बेचारी अपनी जान बचाने में लगी थी। फिर नीचे देखा तो पाया कि उसकी पूँछ का एक भाग नीचे गिरा है और वह कुछ दूरी पर फिर व्यस्त हो चुकी है। हो सकता है उसने मेरे पैर को पेड़ समझा हो।पार्क में बैठे लोगों को मेरा व्यवहार अजीब लग रहा होगा।अब मैंने पैंट के मुँह बंद कर दिये हैं,और गिलहरी कांड पर लिख रहा हूँ।हल्का सा पसीना माथे पर जो आया था वह अब सूख चुका है।गिलहरी की पूँछ बगल में पड़ी है।उसकी शोभा बिगड़ गयी है जैसे प्यार के बिना मनुष्य की शोभा कम हो जाती है।
**महेश रौतेला

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

उठो, अपने प्यार के लिये उठो

उठो, अपने प्यार के लिये उठो
जैसे माँ उठती है,
बहो, अपने प्यार के लिये बहो
जैसे नदी बहती है,
चलो, अपने प्यार के लिये चलो
जैसे हवा चलती है,
पकड़ो, अपने प्यार को पकड़ो
जैसे बच्चे तितलियां पकड़ते हैं,
उछलो, अपने प्यार के लिये उछलो
जैसे समुन्दर उछलता है,
लिखो, अपने प्यार के लिये लिखो
जैसे चिट्ठी लिखी जाती है,
कहो, अपने प्यार के बारे में कहो
जैसे कहानी कही जाती है,
देखो, अपने प्यार को देखो
जैसे नन्हे बच्चे को देखा जाता है।
**महेश रौतेला