शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

बातें कहाँ पूरी होती हैं


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मेरे अल्फाज़

बातें कहाँ पूरी होती हैं

Mahesh Rautela
17 कविताएं
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बातें चलती रहती हैं,
बातें कहाँ पूरी होती हैं,
सूर्योदय से सूर्यास्त तक
शाम से सुबह तक
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

कभी प्यार पर लटकती हैं
कभी आकाश में भटकती हैं,
कभी बचपन चुराती है
कभी यौवन दिखाती हैं
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

आग भी तपाती हैं
सिर भी खपाती हैं,
नरम भी होती है
गरम भी दिखती हैं
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

घर से निकलती हैं
बाहर कुछ चमकती हैं,
राज भी रखती हैं
महाभारत भी करती हैं
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

दुआ बहुत दिलाती हैं
दुनिया बहुत घुमाती हैं,
दोस्त भी बनाती हैं
रिश्ते भी निभाती हैं
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

बातें प्रचुर हँसाती हैं
बातें बहुत रूलाती हैं,
अन्त तक ले जाती हैं
निडर हमें बनाती हैं
बातें कहाँ पूरी होती हैं?

महेश रौतेला  

गीता का अंश हुआ प्रकट

ऐसे ही मन से निखर-निखर
ऐसे ही शब्दों को पकड़-पकड़,
ऐसे ही प्यार में उछल-उछल
गीता का अंश हुआ प्रकट।

युद्धों के अक्षुण्ण जज्बात लिए
शान्ति की दीर्घ पुकार लिए,
मन मानव का जो बिखर गया
गीता में आकर ठहर गया।

पग-पग पर जो लिखा हुआ
भू-भागों में बंटा हुआ,
मानव की ऊष्मा तितर-बितर
गीता सी जब-तब हुयी प्रकट।

नदियों में घोर अँधेरा है
वृक्षों में डर बसा हुआ है,
शहरों में शोर जगा हुआ है
बोलों में मन बँटा हुआ है,
जहाँ देख न सके सही-सही
वहाँ गीता धीरे हुयी प्रकट।

**महेश रौतेला

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

कभी-कभी सुबह-सुबह

कभी-कभी सुबह-सुबह देखने आना-
वह नदी, जो बचपन से बह रही है,
वह पहाड़, जो अडिग है,
वह मृत्यु ,जो पल पल देखी गयी है,
वह समुद्र, जो गरजता रहता है,
वह जंगल, जो बीहड़ हो चुका है।

रास्ते जो कटे -फटे हैं,
पेड़ जो कट रहे हैं,
देश जो बँट रहे हैं,
उदासी जो घिर रही है,
आँसू जो गिर रहे हैं।

खुशियाँ जो गुम होती जा रही हैं,
संस्कृतियां जो नष्ट हो रही हैं,
गांव जो खाली हो रहे हैं,
विवशताएं जो मुँह खोले हैं।

राजनीति जो छिन्न-भिन्न हो रही है,
भ्रष्टाचार जो क्लिष्ट हो रहा है,
 घर जो ढह रहे हैं,
त्योहार जो मर रहे हैं,
गंगा जो मैली बह रही है।

लोग जो बुजुर्ग हो गये हैं,
लड़कियां जो नानी बन गयी हैं,
लड़के जो नाना बन गये हैं,
मौसम जो नये लग रहे हैं,
हँसी जो मध्यम हो चुकी है।

श्मशान जो जल रहे हैं,
कब्रिस्तान जो खुद रहे हैं,
मित्रता जो मिट रही है,
स्रोत जो सूख रहे हैं।
**महेश रौतेला
उस लड़की ने मुझसे कहा," प्रणाम,बाई- बाबू जी, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।"  मैंने बोला ठीक है। फिर वह बोली," ऐसा नहीं बोलना चाहिए, ना।" मैंने बोला क्या वह बोली," आई लव यू।" मैं सोच में पड़ गया। फिर बोला," मुझे बोल सकती हो, लेकिन सबको नहीं बोलते हैं।" वह मेरी बातों से संतुष्ट होकर चली गयी। मैं सोफे में बैठा अतीत के पन्ने खोलने लगा। जब एक बार मैंने भी एक लड़की को बोला था," मैं तुमसे प्यार करता हूँ।" और वह चुप खड़ी मुझे देखती रही थी। उस दिन कई बार हमने एक दूसरे को देखा। एक अद्भुत अनुभूति थी। जैसा कभी नहीं हुआ था। दूसरे दिन मैंने उससे पूछा था," तुम्हें बुरा तो नहीं लगा जो कल मैंने कहा था।" वह बोली," क्या?" मैंने तीन बार ऐसे ही पूछा और वह "क्या?" बोलती रही। मैंने फिर बोल दिया।
एकबार जब मैं उससे मिलने गया तो उसने मेरे हाथ में मूँगफली रखे। और फिर एक सन्नाटा हमारे बीच छा गया था। बातें कुछ नहीं हुईं। वह मुझे छोड़ने दूर तक आयी। कुछ दूर आकर मैंने उससे कहा," तुम्हें अब लौट जाना चाहिए।"  वह लौट गयी। मैंने मुड़कर देखा तो वह भी मुड़कर पीछे देख रही थी।
तीन साल बाद वह मेरे दोस्त को, एक शहर में मिली। मेरे बारे में उससे पूछ रही थी। मेरे दोस्त ने कुछ बताया, कुछ नहीं बताया। मैं उसे खोजने उस शहर गया, बिना पते के। यों ढ़ूंढना मुश्किल था। हारकर, अच्छे साहित्य की कुछ किताबें खरीदी और तीसरे दिन वापिस आ गया।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

ओ मेरी सरकार

ओ मेरी सरकार
ये भी बंद कर दे, व भी बंद कर दे
रोजगार भी बंद कर दे,
केवल भाषण दे दे,
गपसप चला दे।
जहाँ भी जाऊँ
एक घूँट चाय पिऊँ,
और लम्बी हाँक कर
तन कर सो जाऊँ।
जनता रोये तो रोये
चुनाव में पिटे तो पिटे,
ओ मेरी सरकार
ये भी बंद कर दे, व भी बंद कर दे,
अठन्नी -चवन्नी इधर भी खिसका दे।
-महेश रौतेला

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

जीवन में कम से कम एक बार प्यार कीजिए

१.
जीवन में कम से कम एक बार प्यार कीजिए:

जीवन में कम से कम एक बार प्यार कीजिए,
ठंड हो या न हो, उजाला हो या न हो,
अनुभूतियां शिखर तक जाएं या नहीं,
रास्ता उबड़-खाबड़ हो या सरल,
हवायें सुल्टी बहें या उल्टी बहें,
पगडण्डियां पथरीली हों या कटीली,
कम से कम एकबार दिल को खोल दीजिए।

तुम्हारी बातें कोई सुने या न सुने,
तुम कहते रहो ," मैं प्यार करता हूँ।"
तुम बार-बार आओ और गुनगुना जाओ।

तुम कम से कम एक बार सोचो,
एक शाश्वत ध्वनि के बारे में जो कभी मरी नहीं,
एक अद्भुत लौ के बारे में जो कभी बुझी नहीं,
उस शान्ति के बारे में.जो कभी रोयी नहीं,
कम से कम एकबार प्यार को जी लीजिए।

यदि आप प्यार कर रहे हैं तो अनन्त हो रहे होते हैं,
कम से कम एक बार मन को फैलाओ डैनों की तरह,
बैठ जाओ प्यार की आँखों में चुपचाप,
सजा लो अपने को यादगार बनने के लिए,
सांसों को खुला छोड़ दो शान्त होने के लिए।

एकबार जंगली शेर की तरह दहाड़ लो केवल प्यार के लिए,
लिख दो किसी को पत्र,पत्रऔर पत्र,
नहीं भूलना लिखना पत्र पर पता और अन्दर प्रिय तुम्हारा,
लम्बी यात्राओं पर एकबार निकल लो केवल प्यार के लिए।

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२.
मेरा पता:

शुभ्र मन, शुभ्र तन, शुभ्र हिमालय मेरा पता,
शुभ्र गाँव, शुभ्र शहर,शुभ्र भारत मेरा पता,
शुभ्र मिट्टी, शुभ्र नदी, शुभ्र वृक्ष मेरा पता,
शुभ्र राह, शुभ्र जीवन, शुभ्र प्यार मेरा पता।

खो गया यहीं कहीं तो ढूंढ लेना मेरा पता,
साफ-साफ दिखे नहीं तो  माँग लेना पावन पता,
आत्मा के पार  पहुंचा शुभ्र द्वार ही मेरा पता,
शुभ्र गीत, शुभ्र संगीत, शुभ्र लय ही मेरा पता।

निकल कर जो बहा वही है मेरा पता,
दुख में जो मिटा नहीं वही है मेरा पता,
हँसते-रोते जो लिखा गया  वही है मेरा पता,
शुभ्र शब्द, शुभ्र नाम,शुभ्र काम मेरा पता।

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३.
कविताएं महकती रहेंगी:

कविताएं महकती रहेंगी,
पहाड़ी वृक्षों की तरह,
समुद्री जीवों की भाँति तैरती रहेंगी,
या चीते की तरह छलांग लगा सकती हैं,
पक्षियों की तरह उड़ने का प्रयास कर सकती हैं,
मनुष्य अच्छा रहेगा या बुरा रहेगा,
कविताएं लिखी जायेंगी।
दुनिया केवल प्यार से नहीं चलती है,
कर्म भी चाहिए उत्तम,
या कहें महाभारत सा कुछ बनता बिगड़ता है यहाँ,
हमारे अन्दर का मनुष्य जब तक मरा न हो,
कविता-कहानी महकती रहेंगी।

बांबियों से निकलता मनुष्य
गुफाओं से निकलता मनुष्य,
महलों से निकलता मनुष्य,
झोपड़ियों से निकलता मनुष्य,
सभी को महक कभी भी मिल सकती है।
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* महेश रौतेला